Manoj Jarange Patil Biography in Hindi: नमस्कार दोस्तों! आज हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के संघर्ष योद्धा मनोज जरांगे पाटील की, जो मराठा समुदाय के आरक्षण के लिए सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं। वे न सिर्फ एक एक्टिविस्ट हैं, बल्कि लाखों लोगों की उम्मीद का प्रतीक बन चुके हैं। इस लेख में हम उनके जीवन की पूरी कहानी जानेंगे – उनके बचपन से लेकर आज के आंदोलनों तक। अगर आप मराठा आरक्षण के बारे में उत्सुक हैं या किसी ऐसे शख्स की कहानी पढ़ना चाहते हैं जो चुनौतियों से कभी नहीं डरता, तो यह लेख आपके लिए है। चलिए शुरू करते हैं!
मनोज जरांगे पाटील का जीवन परिचय: संक्षिप्त बायोग्राफी (Wiki/Bio)
मनोज जरांगे पाटील का जीवन संघर्ष और समर्पण से भरा है। यहां उनकी कुछ मुख्य जानकारियां एक टेबल में दी गई हैं, ताकि आसानी से समझ आए:
विवरण | जानकारी |
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पूरा नाम | मनोज रावसाहेब जरांगे पाटील (जाने जाते हैं संघर्ष योद्धा के नाम से) |
जन्म तिथि | 1 अगस्त 1982 |
जन्म स्थान | माथोरी गांव, गेवराई तालुका, बीड जिला, महाराष्ट्र |
वर्तमान निवास | अंतरवाली सराटी, जालना जिला, महाराष्ट्र |
माता/पिता का नाम | रावसाहेब जरांगे, प्रभावती जरांगे |
जीवन आधारित फिल्म | संघर्ष योद्धा- मनोज जरांगे पाटील |
परिवार | तीन भाई, पत्नी और चार बच्चे (नाम सार्वजनिक नहीं) |
शिक्षा | माध्यमिक स्तर तक (कक्षा 10+2), बीड जिले से |
पेशा | किसान, सामाजिक कार्यकर्ता |
चर्चा का विषय | मराठा आरक्षण आंदोलन |
राजनीतिक पृष्ठभूमि | 2004 तक कांग्रेस पार्टी के जिला युवा अध्यक्ष, अब अपोलिटिकल एक्टिविस्ट |
यह संक्षिप्त बायोग्राफी उनके जीवन की एक झलक देती है, लेकिन असली कहानी तो उनके संघर्ष में छिपी है। मनोज जरांगे पाटील के जीवन पर आधारित एक मराठी फिल्म “संघर्ष योद्धा” बानी है।
कौन हैं मनोज जरांगे पाटील?

मनोज जरांगे पाटील महाराष्ट्र के बीड जिले के एक छोटे से गांव माथोरी में जन्मे एक 43 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका बचपन साधारण परिवार में बीता, जहां पिता रावसाहेब और मां प्रभावती के साथ तीन भाइयों के साथ था। शुरुआती में घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्होंने जालना के अंबड शहर में एक होटल में काम किया। लेकिन उनकी जिंदगी का असली मोड़ तब आया जब वे मराठा समुदाय के आरक्षण के मुद्दे से जुड़े। और पिछले 15 सालों से वे इस लड़ाई में डटे हुए हैं, और आज वे महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में एक प्रमुख चेहरा बन चुके हैं।
वे खुद को अपोलिटिकल बताते हैं, लेकिन उनकी जड़ें राजनीति से जुड़ी हैं। 2004 तक वे कांग्रेस पार्टी के जिला युवा अध्यक्ष रहे, लेकिन जब उन्हें लगा कि पार्टी मराठा मुद्दों पर कमजोर पड़ रही है, तो उन्होंने अलग रास्ता चुना। उसके बाद उन्होंने ‘शिवबा संगठन’ की स्थापना की, जो मराठा हितों के लिए काम करता है। मनोज पाटील का जीवन साबित करता है कि सच्चा समर्पण किसी पद या पार्टी पर निर्भर नहीं होता।
परिवार और निजी जीवन

मनोज जरांगे पाटील का परिवार उनके लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा है। वे अपने माता-पिता और भाइयों के साथ एक संयुक्त परिवार में बड़े हुए। शादीशुदा होने के बावजूद, उन्होंने अपनी पत्नी और चार बच्चों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया है, शायद निजी जीवन को सुरक्षित रखने के लिए। घर की जिम्मेदारियां निभाते हुए भी वे आंदोलन से कभी पीछे नहीं हटे। कई बार उन्होंने अपनी कृषि भूमि बेचकर विरोध प्रदर्शनों को फंड किया, जो उनके त्याग की मिसाल है। उनका वर्तमान घर अंतरवाली सराटी गांव में है, जहां से वे अपने आंदोलनों की योजना बनाते हैं।
शिक्षा और शुरुआती संघर्ष
शिक्षा के मामले में मनोज की राह आसान नहीं थी। उन्होंने बीड जिले से ही प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की, जो कक्षा 12 तक सीमित रही। औपचारिक डिग्री न होने के बावजूद, उनकी समझ और जज्बा किसी पढ़े-लिखे नेता से कम नहीं। शुरुआती दिनों में उन्होंने खेतों में मजदूरी की, होटलों में काम किया, और परिवार का पालन-पोषण किया। उनके ये अनुभव ही उन्हें मराठा समुदाय की गरीबी और असमानता से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि शिक्षा किताबों से नहीं, जीवन के सबकों से मिलती है – और यही उनकी ताकत है।
करियर और राजनीतिक सफर
मनोज जरांगे पाटील का करियर राजनीति और सामाजिक कार्य से जुड़ा है। कांग्रेस में युवा नेता के रूप में शुरुआत करने के बाद, उन्होंने पार्टी छोड़ दी और शिवबा संगठन बनाया। यह संगठन मराठा हितों के लिए जाना जाता है, और इसमें उन्होंने कई बड़े मामलों में भूमिका निभाई। उदाहरण के लिए, अहमदनगर के कोपर्डी मामले में उनका संगठन जुड़ा रहा, जिसने उन्हें सुर्खियों में लाया।
वे मुख्य रूप से किसान हैं, लेकिन उनका असली काम मराठा आरक्षण की वकालत है। 2021 में जालना के साष्ठा पिंपलगांव में उन्होंने आठ महीने लंबा आंदोलन चलाया। ‘गोरीगांधारी’ आंदोलन के जरिए उन्होंने शहीद परिवारों को आर्थिक मदद दी। औरंगाबाद डिविजनल कमिश्नरेट पर मार्च (मोर्चा) और जालना में कई प्रदर्शन उनके नेतृत्व की मिसाल हैं। राजनीति से दूर रहते हुए भी, वे महाराष्ट्र के बड़े नेताओं को चुनौती देते हैं।
मनोज जरांगे पाटील और मराठा आरक्षण आंदोलन: उनका मुख्य संघर्ष
मनोज जरांगे पाटील का नाम मराठा आरक्षण से जुड़ा है। वे मांग करते हैं कि मराठा समुदाय को ओबीसी कैटेगरी में शामिल किया जाए, और सभी को कुनबी जाति प्रमाणपत्र मिले। कुनबी और मराठा के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं – कुनबी किसान समुदाय है, जबकि मराठा योद्धाओं के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन दोनों की जड़ें कृषि में हैं, और साझा उपनाम जैसे ‘जाधव’ इस ओवरलैप को दिखाते हैं।

मनोज ने 2011 से अब तक 35 से ज्यादा विरोध प्रदर्शन किए। उन्होंने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से पूर्ण आरक्षण की मांग की, और अधूरे वादों पर सवाल उठाए। उनके आंदोलनों में भूख हड़ताल, मार्च और शांतिपूर्ण विरोध शामिल हैं। उन्होंने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया, बल्कि विधानसभा के विशेष सत्र की मांग की। मराठा समुदाय के लिए वे ‘संघर्ष योद्धा’ हैं, और उनकी लड़ाई ने महाराष्ट्र की राजनीति को हिला दिया।
मराठी आरक्षण आंदोलन लेटेस्ट अपडेट्स: मुंबई आंदोलन और वर्तमान स्थिति
अगस्त 2025 में मनोज जरांगे पाटील फिर से सुर्खियों में हैं। जनवरी 2025 में उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जिस दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी लेकिन वे डटे रहे। जुलाई 2025 में उन्होंने सरकार को 26 अगस्त तक आरक्षण देने की डेडलाइन दी, वरना आंदोलन की धमकी दी। 24 अगस्त को उन्होंने ‘चलो मुंबई’ मार्च (मोर्चा) का ऐलान किया, जहां पूरे महाराष्ट्र से मराठा समुदाय के लोग शामिल होने वाले हैं। हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा है कि बिना परमिशन के प्रदर्शन नहीं हो सकता।
इसके अलावा, सरकार ने उनकी एक मांग मानी – शिंदे कमिटी की रिपोर्ट की समयसीमा बढ़ाई। लेकिन मनोज का कहना है कि वे आधी-अधूरी योजना नहीं मानेंगे। दिसंबर 2024 में उन्होंने बीड के सरपंच हत्याकांड की जांच में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी दी। 2024 के विधानसभा चुनाव से उन्होंने खुद को दूर रखा, लेकिन उनका प्रभाव राजनीति पर साफ दिखा। 26 अगस्त 2025 के अपडेट के मुताबिक, उनका आंदोलन जारी है, और वे मुंबई की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी सेहत चिंता का विषय बनी हुई है, लेकिन उनका जज्बा कम नहीं हुआ।
मनोज जरांगे पाटील: एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व
मनोज जरांगे पाटील सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई का प्रतीक हैं। एक छोटे गांव से निकलकर उन्होंने लाखों दिलों में जगह बनाई। उनका जीवन सिखाता है कि समर्पण से कोई भी बदलाव ला सकता है। उनके आंदोलन को सरकार की ओर से दबाने की कोशिशें हुईं, लेकिन वे कभी पीछे नहीं हटे। बड़े-बड़े नेताओं के सामने भी वे नहीं झुके। हालाँकि, उन्हें बदनाम करने की कई कोशिशें हुईं, फिर भी उनका अपने लक्ष्य से ध्यान जरा भी नहीं भटका और उनका संघर्ष आज भी जारी है। मराठा समुदाय के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा और ईमानदारी ही उनकी असली ताकत है। शायद यही कारण है कि उन्हें “संघर्ष योद्धा” कहा जाता है। अगर आप भी सामाजिक मुद्दों में रुचि रखते हैं, तो उनके जैसे लोगों की कहानियां जरूर पढ़ें। क्या आपको लगता है कि आरक्षण जैसे मुद्दे कैसे सुलझ सकते हैं? कमेंट में बताएं। और हां, ऐसी ही दिलचस्प बायोग्राफी के लिए हमारी साइट पर बने रहें। धन्यवाद!